सार्वजनिक भूमि, आस्था स्थल और बिगड़ती व्यवस्था पर गंभीर सवाल

सिधुआ बांगर : चुप्पी का खामियाजा भुगतता गांव

सार्वजनिक भूमि, आस्था स्थल और बिगड़ती व्यवस्था पर गंभीर सवाल

ओम पत्रिका न्यूज
संपादकीय : के एन साहनी
सिधुआ बांगर आज केवल एक गांव भर नहीं रह गया है, बल्कि यह उन तमाम गांवों के लिए एक चेतावनी बन चुका है, जहां लोग गलत होते देख चुप रह जाते हैं। इतिहास गवाह है—जब समाज अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं उठाता, तब वही अन्याय धीरे-धीरे व्यवस्था बन जाता है और उसका खामियाजा पूरी पीढ़ी को भुगतना पड़ता है।

आजादी के दशकों बाद भी यदि किसी गांव के खलिहान, खेल का मैदान, पोखरी और अन्य सार्वजनिक भूमि अवैध कब्जों में फंसी हों, तो यह सिर्फ प्रशासन की नाकामी नहीं, बल्कि गांव की सामूहिक चेतना की भी हार है। यह नुकसान किसी एक व्यक्ति या परिवार का नहीं, बल्कि पूरे गांव का है—जिसका सीधा असर विकास, सामाजिक समरसता और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर पड़ता है।

जब अनुशासन था, तब गांव मजबूत था

सिधुआ बांगर ने वह दौर भी देखा है जब गांव में अनुशासन था, व्यवस्था थी और गलत करने वालों में डर बना रहता था।
स्वर्गीय विश्वनाथ सिंह, भगवान सिंह, केदार सिंह और शंभू सिंह जैसे लोग सार्वजनिक हित के मामलों में सख्ती से खड़े रहते थे। उनके रहते न तो सार्वजनिक जमीनों पर कब्जा करना आसान था और न ही मनमानी की गुंजाइश।
आज वे व्यक्तित्व हमारे बीच नहीं हैं। उनका वंश आज भी गांव में मौजूद है, लेकिन दुर्भाग्यवश गांव की सामाजिक और नैतिक व्यवस्था कमजोर पड़ी है। नतीजा यह है कि अव्यवस्था और मनमानी धीरे-धीरे सामान्य होती जा रही है।
सब कुछ होते हुए भी अमन नहीं
क्षेत्रफल और आबादी के लिहाज से सिधुआ बांगर एक बड़ा गांव है। सभी धर्म और जातियों के लोग यहां रहते हैं, इसके बावजूद गांव में अमन-चैन का अभाव महसूस किया जा रहा है। यह स्थिति साफ संकेत देती है कि समस्या केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि सोच और जिम्मेदारी की भी है।
आस्था स्थलों की उपेक्षा, सामाजिक चेतावनी
गांव की सुरक्षा और मजबूती केवल कानून से नहीं होती, आस्था भी उसमें बड़ी भूमिका निभाती है।
गांव के पूर्व में ब्रह्मस्थान और पश्चिम में मां दुर्गा का स्थान है, लेकिन दोनों ही स्थल आज भी उपेक्षा के शिकार हैं।
बरसात के दिनों में मां दुर्गा मंदिर तक पहुंचना कठिन हो जाता है। जर्जर रास्ता और कीचड़ भरा मार्ग श्रद्धालुओं की आस्था को चुनौती देता है। सवाल यह है कि जब श्रद्धालु पहुंच ही नहीं पाएंगे, तो पूजा, परंपरा और विश्वास कैसे जीवित रहेंगे?
मां दुर्गा किसी एक व्यक्ति या वर्ग की नहीं, पूरे गांव की मां हैं।
मंदिर भी सबका है—तो फिर उसकी जिम्मेदारी कुछ लोगों तक सीमित क्यों रह जाए?
शिव मंदिर से मिली एकता की सीख

गांव को शिव मंदिर का निर्माण अवश्य याद रखना चाहिए।

शिलान्यास फूलबदन निषाद ने किया और निर्माण कार्य सभी वर्गों के सहयोग से पूरा हुआ। आज हर जाति और हर समाज के लोग वहां समान भाव से शीश झुकाते हैं। यह मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि गांव की एकता का प्रतीक है।
दुर्गा मंदिर के लिए पहल, अब गांव की कसौटी
पुराने और जर्जर मां दुर्गा मंदिर के जीर्णोद्धार की दिशा में बाबू गुल्लू सिंह ने पहल करते हुए निर्माण सामग्री गिराई है। उनका स्पष्ट कहना है कि सबसे पहले मंदिर तक पहुंचने वाला रास्ता सुरक्षित और पक्का होना चाहिए, ताकि हर मौसम में श्रद्धालु वहां पहुंच सकें।
यह पहल सराहनीय है, लेकिन अब असली परीक्षा पूरे गांव की है।
जनहित का स्पष्ट संदेश
अब समय आ गया है कि
सार्वजनिक भूमि को कब्जामुक्त कराया जाए
आस्था स्थलों का समुचित विकास किया जाए
और गांव की सामाजिक व नैतिक व्यवस्था को फिर से मजबूत किया जाए
अगर आज भी सिधुआ बांगर नहीं जागा,
तो आने वाली पीढ़ियां न माफ करेंगी और न भूलेंगी।
यह कोई साधारण खबर नहीं,
जनहित में एक गंभीर चेतावनी है।
अब सिधुआ बांगर को तय करना है—

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