बुद्धभूमि पर अमर हो गए भदंत ज्ञानेश्वर जी — श्रद्धा, शांति और करुणा की अनुगूँज
कुशीनगर (के एन साहनी)

हमने इतिहास में पढ़ा था कि जब भगवान बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ था, तब तत्कालीन कुशीनारा के मल्ल राजाओं ने उनका अंतिम संस्कार बड़े ही राजसी और आदरपूर्ण रीति-रिवाज से संपन्न किया था। उस समय दूर-दूर से आने वाले राजाओं को बुद्ध के अंतिम दर्शन का अवसर देने के लिए उनके पार्थिव शरीर को सात दिनों तक सुरक्षित रखा गया था, और सातवें दिन रामाभार (मुकुट चैत बंधन) पर उनका संस्कार हुआ था।

आज, ढाई हजार वर्ष बाद, इतिहास ने स्वयं को दोहराया।
म्यांमार बुद्ध विहार कुशीनगर के प्रमुख एवं समस्त बौद्ध विहारों के अग्रज भदंत ज्ञानेश्वर जी का बीमारी के कारण 31 अक्टूबर 2025 को निधन हो गया। उनके पार्थिव शरीर को 10 नवंबर तक विहार में दर्शनार्थ रखा गया, जहाँ देश-विदेश से हजारों अनुयायी और श्रद्धालु पहुंचकर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते रहे।
11 नवंबर की सुबह लगभग 10 बजे उनकी अंतिम यात्रा म्यांमार बुद्ध विहार से आरंभ हुई। शव वाहन के निकलते ही जनसैलाब उमड़ पड़ा। ध्वनि विस्तारक यंत्रों से भिक्षुओं द्वारा मंगलसूत्र का पाठ किया जा रहा था और वातावरण में गूंजती करुण ध्वनि यात्रा को शोकाकुल बना रही थी। कतारबद्ध भिक्षु, श्रद्धालु और नागरिक मौन साधे शव वाहन के पीछे-पीछे चल रहे थे।
1936 में म्यांमार में जन्मे भदंत ज्ञानेश्वर जी ने 1963 में भारत आकर भिक्षु चंद्रमणि (जिन्होंने 1956 में डॉ. भीमराव अंबेडकर को धम्म दीक्षा दी थी) से दीक्षा ग्रहण की थी। तब से वे बुद्ध के मानवता, करुणा और समता के विचारों के प्रचार-प्रसार में आजीवन समर्पित रहे।
यात्रा जब रामाभार स्तूप के निकट पहुंची, तो शव वाहन कुछ देर ठहर गया — मानो भदंत जी स्वयं कह रहे हों, “मुझे अपने शास्ता की भूमि को अंतिम बार नमन करने दो।”
भंते चैत मुकुट बंधन के नेतृत्व में वहां मंगल सूत्र का पाठ हुआ और श्रद्धालुओं ने बुद्धभूमि को नमन किया।
मार्ग के दोनों ओर विद्यालयों के छात्र-छात्राएं पुष्पवर्षा कर रहे थे। यह दृश्य इतिहास के पन्नों को जीवंत कर रहा था — मानो बुद्ध की अंतिम यात्रा पुनः साकार हो उठी हो।
अंततः शव वाहन अंतिम संस्कार स्थल पर पहुंचा। मंडप सुसज्जित था, और जनसैलाब मौन साधे बैठा था। बौद्ध रीति से मंत्रोच्चार के बीच चिता प्रज्वलित की गई। सूर्यास्त की सुनहरी किरणों के साथ भदंत ज्ञानेश्वर जी की देह पंचतत्व में विलीन हो गई।
अब केवल उनकी देह नहीं, बल्कि उनके विचार शेष हैं —
मानवता, करुणा और शांति के वे विचार जो सदैव इस जगत को आलोकित करते रहेंगे।

