भुखमरी और कुपोषण से जूझ रहा खदही क्षेत्र, 20 वर्षों से अवैध इलाज का खेल जारी
कुशीनगर। खदही क्षेत्र भुखमरी और कुपोषण की गंभीर मार झेल रहा है। आस-पास कोई प्रमुख चौराहा न होने के कारण यहां तक पहुंचना और बुनियादी सुविधाएं पाना बेहद मुश्किल है। सपहां सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, कसया की टीम के जिम्मे यह इलाका आता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि स्वास्थ्य सेवाओं की हालत बद से बदतर है।


सबसे ज्यादा दयनीय स्थिति मुसहर समुदाय की है, जो गरीबी, बेरोजगारी और सरकारी लापरवाही के कारण पर्याप्त भोजन और इलाज से वंचित हैं। इसी बीच, तापस मलिक नामक एक कथित बंगाली डॉक्टर पिछले 20 वर्षों से बिना पंजीकरण और बिना चिकित्सकीय योग्यता के दवा और इलाज का धंधा खुलेआम चला रहा है।
कानूनी पहलू
विशेषज्ञों के अनुसार—
- इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट, 1956 की धारा 15(2)(b) के तहत बिना मान्यता प्राप्त डिग्री के चिकित्सकीय कार्य करना दंडनीय अपराध है।
- मरीज को नुकसान या मौत होने पर IPC 304A (लापरवाही से मृत्यु), 420 (धोखाधड़ी) और 269-270 (संक्रामक रोग फैलाने का खतरा) के तहत कार्रवाई संभव है।
जमीनी हकीकत और चौंकाने वाला खुलासा
सूत्रों के अनुसार, जनपद कुशीनगर में करीब 2,500 बंगाली कथित डॉक्टर बिना लाइसेंस और डिग्री के इलाज कर रहे हैं। हालत बिगड़ने पर ये दुकान बंद कर फरार हो जाते हैं।
खदही गांव के बगल के चौराहे पर भी तापस मलिक का ‘मेडिकल’ संचालित हो रहा है, जहां वह बिना डिग्री के ग्लूकोज बोतल चढ़ा रहा है। हाल ही में न्यूज टीम ने मौके पर उसकी दूसरी पत्नी को किराए के घर में चारपाई पर एक साधु को ग्लूकोज चढ़ाते रंगे हाथों पकड़ा, तो पोल खुल गई।
ताज़ा मामला — बच्चे की जान पर खेल
सिसवा में एक कथित बंगाली डॉक्टर द्वारा इंजेक्शन लगाए जाने के बाद एक बच्चे की हालत गंभीर हो गई। परिजनों के विरोध से घबराकर आरोपी क्लिनिक छोड़कर फरार हो गया। यह घटना साफ करती है कि यह नेटवर्क न सिर्फ खदही, बल्कि पूरे जनपद में फैला हुआ है।
जोकवा बाजार में फर्जी इलाज का खुलासा
जोकवा बाजार में भी मरीजों के साथ खिलवाड़ की शिकायतें मीडिया की टीम ने कैमरे में कैद की हैं। कई फर्जी डॉक्टर यहां खुलेआम इलाज करते दिखे, जबकि स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन पूरी तरह चुप्पी साधे हुए है।
गाँव-गाँव फैला मौत का कारोबार
रहसू, दहारिपट्टी, जोकवा, फज़ीलनगर समेत कई इलाकों के गाँवों और चौक-चौराहों पर बंगाली फर्जी डॉक्टर क्लिनिक और दवा दुकान खोलकर मौत बाँट रहे हैं। किसी हादसे या मरीज की हालत बिगड़ने पर ये तुरंत दुकान बंद कर भाग निकलते हैं, और फिर कुछ दिनों बाद किसी नए ठिकाने पर दोबारा सक्रिय हो जाते हैं।
दवा सप्लाई का काला खेल
स्वास्थ्य विभाग की मिलीभगत से कई मेडिकल एजेंसी वाले भी बिना लाइसेंस इन बंगालियों को दवाएं सप्लाई कर रहे हैं, जिससे यह अवैध कारोबार और मजबूत हो रहा है। स्वास्थ्य विभाग की संभावित कार्रवाई के डर से कई बंगाली ‘डॉक्टर’ इन दिनों भूमिगत हो गए हैं, लेकिन जिनके खिलाफ FIR और धरपकड़ नहीं होगी, वे जल्द ही फिर सक्रिय हो जाएंगे।
सवाल सीधा है — डीएम साहब, कब होगी इनके खिलाफ धरपकड़ और क्लिनिक सील की कार्रवाई?
गरीबों की जान से खिलवाड़ आखिर कब तक बर्दाश्त किया जाएगा?