

कुशीनगर।
आजादी को 78 वर्ष पूरे होने के बाद भी हाटा विधानसभा क्षेत्र का आखिरी गाँव मठ सूरज गिर का टोला करजहां घाट विकास के नाम पर सिर्फ सरकारी फाइलों में ही मौजूद है। यह गाँव सर्वाधिक पिछड़ी जातियों की बस्ती है, जो एक छोटी झील के किनारे बसा है। मूलभूत सुविधाएँ यहाँ आज भी सपना बनी हुई हैं।
करजहां घाट की खासियत यह है कि यह तीन जिलों कुशीनगर, देवरिया और गोरखपुर एक सेतुः पर है, लेकिन इस विशेष स्थिति के बावजूद यह विकास योजनाओं में अनदेखा किया जाता रहा है। हाटा से मात्र 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह गाँव अपनी खस्ताहाल सड़कों, गंदगी और बदहाल व्यवस्था पर आँसू बहा रहा है। बरसात में सड़कें कीचड़ में बदल जाती हैं, जिससे बच्चों और बुजुर्गों का निकलना भी मुश्किल हो जाता है।
विद्यालय और आँगनवाड़ी की हालत खराब
गाँव में मौजूद प्राथमिक विद्यालय और आँगनवाड़ी केंद्र की स्थिति भी दयनीय है। भवन जर्जर हैं, पानी और शौचालय की व्यवस्था नहीं है। बच्चे फर्श पर बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं। बच्चों के पोषण और शिक्षा के लिए बनी सरकारी योजनाएँ कागजों में सीमित हैं।
पूनम देवी बनीं पहली महिला प्रधान, पर नहीं मिला पर्याप्त बजट
इतिहास में पहली बार इस गाँव ने पूनम देवी पत्नी परसुराम निषाद को ग्राम प्रधान चुना, जिनसे ग्रामीणों को आशा थी कि गाँव की तस्वीर बदलेगी। परन्तु, पर्याप्त बजट न मिलने और सिस्टम की लापरवाही के चलते सड़क, नाली, पीने का पानी, स्वास्थ्य व्यवस्था और शिक्षा पर खर्च नहीं हो सका।
इतिहास में करजहां घाट का महत्व
पुरानी कहानियों और बुजुर्गों की बातों के अनुसार, करजहां घाट एक समय में नाव घाट और व्यापारिक आवाजाही का केंद्र रहा है। हाटा, देवरिया और गोरखपुर की सीमाओं को जोड़ने वाला यह स्थान महात्मा गाँधी के असहयोग आंदोलन और आजादी के बाद गाँव में आए राजनीतिक नेताओं की सभाओं का गवाह भी रहा है। लेकिन समय के साथ इसका ऐतिहासिक महत्व प्रशासन की नजरों से ओझल होता गया।
ग्रामीणों की माँग
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से बार-बार गाँव की स्थिति सुधारने, सड़क निर्माण, पेयजल व्यवस्था, विद्यालय की मरम्मत और स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने की माँग की है, लेकिन हर बार उन्हें आश्वासन और सर्वे की औपचारिकता में ही टाल दिया गया।
आखिरी गाँव, आखिरी उम्मीद
करजहां घाट मठ सूरज गिर का टोला आज भी विकास की राह देख रहा है। यह गाँव प्रशासन और सरकार के लिए एक आईना है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुँचाना अभी भी चुनौती बना हुआ है।
यदि इस गाँव को मुख्यधारा से जोड़ना है, तो सड़क और स्वास्थ्य व्यवस्था पर प्राथमिकता के साथ कार्य करना जरूरी है, ताकि इतिहास में इस गाँव का नाम सिर्फ पिछड़ेपन से नहीं, बल्कि विकास की नई मिसाल के रूप में भी लिया जा सके।