मां-बाप की दुनिया होती है उनकी औलाद, लेकिन क्या हर औलाद अपने कर्तव्य को समझती है?


के.एन.साहनी (संपादकीय)


मां और बाप केवल दो शब्द नहीं हैं, बल्कि त्याग, तपस्या, प्रेम और समर्पण की ऐसी जीवंत प्रतिमाएं हैं जिनके ऋण से कोई संतान कभी मुक्त नहीं हो सकती। जब एक शिशु इस संसार में जन्म लेता है, उसी क्षण से माता-पिता का अपना जीवन मानो पीछे छूट जाता है और उनकी पूरी दुनिया अपनी संतान के इर्द-गिर्द सिमट जाती है।
एक मां रात-रात भर जागकर अपने बच्चे को गोद में सुलाती है। पिता अपनी इच्छाओं का त्याग कर भविष्य की नींव तैयार करता है। मां की नजर अपने बच्चे के होंठों पर रहती है कि कहीं उसे भूख तो नहीं लगी, कहीं वह प्यासा तो नहीं है, कहीं वह कुछ कहना तो नहीं चाहता। पिता की निगाह इस बात पर रहती है कि उसके बच्चे के जीवन में किसी चीज़ की कमी न रह जाए। माता-पिता की हर सांस, हर दुआ और हर संघर्ष का केंद्र उनकी संतान होती है।
बचपन से लेकर युवावस्था तक माता-पिता अपनी संतान को केवल पालते ही नहीं, बल्कि संस्कार, शिक्षा, अनुशासन और जीवन जीने की कला भी सिखाते हैं। वे स्वयं कठिनाइयों का सामना करते हैं ताकि उनके बच्चे को कभी अभाव का अनुभव न हो। अनेक बार माता-पिता अपने सपनों का गला घोंट देते हैं, लेकिन बच्चों के सपनों को उड़ान देने में कोई कमी नहीं छोड़ते।
लेकिन समय का सबसे बड़ा दुर्भाग्य तब सामने आता है, जब वही संतान सफलता प्राप्त करने के बाद अपने माता-पिता को बोझ समझने लगती है। जिन हाथों ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, उन्हीं हाथों को बुढ़ापे में सहारे की आवश्यकता होती है। उस समय यदि संतान साथ छोड़ दे, तो यह केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की नैतिक हार होती है।
औलाद होने का गर्व केवल जन्म लेने से नहीं मिलता। सच्चा गर्व तब होता है जब संतान अपने माता-पिता के सम्मान, सेवा और सुरक्षा का संकल्प निभाती है। जो बेटा या बेटी अपने वृद्ध माता-पिता का सहारा बनते हैं, उनकी दवा, देखभाल, सम्मान और भावनाओं का ध्यान रखते हैं, वही वास्तव में अपने जन्म का उद्देश्य पूरा करते हैं।
आज आधुनिक जीवन की भागदौड़ में रिश्तों की गर्माहट कहीं न कहीं कम होती दिखाई दे रही है। भौतिक सुख-सुविधाओं की दौड़ में माता-पिता के साथ बैठकर दो पल बात करने का समय भी कई लोगों के पास नहीं है। यह स्थिति चिंता का विषय है। वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या केवल एक सामाजिक व्यवस्था नहीं, बल्कि हमारी संवेदनाओं के कमजोर होने का संकेत भी है।
समाज को यह समझना होगा कि माता-पिता की सेवा किसी एहसान का नाम नहीं, बल्कि हमारा नैतिक और मानवीय कर्तव्य है। जो माता-पिता अपनी पूरी जिंदगी अपने बच्चों की मुस्कान के लिए समर्पित कर देते हैं, उन्हें बुढ़ापे में अकेलापन और उपेक्षा नहीं, बल्कि सम्मान और अपनापन मिलना चाहिए।
हर बेटे और बेटी को यह याद रखना चाहिए कि आज जिन माता-पिता के कदम धीमे हो गए हैं, कभी उन्हीं कदमों ने उन्हें चलना सिखाया था। आज जिन आंखों की रोशनी कम हो गई है, कभी उन्हीं आंखों ने उनकी हर खुशी और हर आंसू को पढ़ा था। आज जिन हाथों में कंपन है, कभी उन्हीं हाथों ने उन्हें गिरने से बचाया था।
किसी भी समाज की असली पहचान उसकी ऊंची इमारतों या आर्थिक विकास से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वहां माता-पिता और बुजुर्गों को कितना सम्मान मिलता है। यदि हम अपने माता-पिता का सम्मान नहीं कर पाए, तो हमारी सारी उपलब्धियां अधूरी हैं।
आइए, हम संकल्प लें कि अपने माता-पिता को केवल जीवन देने वाला नहीं, बल्कि जीवन का सबसे बड़ा वरदान मानेंगे। उनके सम्मान, सेवा और स्नेह को अपनी सबसे बड़ी जिम्मेदारी समझेंगे। क्योंकि दुनिया में हर रिश्ता किसी न किसी कारण से बनता है, लेकिन मां-बाप का रिश्ता केवल निस्वार्थ प्रेम पर टिका होता है। उनके प्रेम का कोई मूल्य नहीं, कोई विकल्प नहीं और कोई प्रतिदान नहीं।
याद रखिए— जिस घर में माता-पिता की मुस्कान सुरक्षित रहती है, वही घर वास्तव में स्वर्ग बन जाता है।

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