औपनिवेशिक प्रतीक या लोकतांत्रिक विडंबना? राष्ट्रपति भवन पर उठे तीखे सवाल

डॉक्टर संपूर्णानंद गाँधी ने कहा भारत का’औपनिवेशिक फीचर’ कैसे बदलेगा? बदलेगा’ शिक्षा’परिवर्तन विज्ञान’संविधान’ से ‘धीरे-धीरे’
“नाम एवं फोटो बदल गई”
“बदलना ही था तो वहां गांधी की तस्वीर लगाए होते यहां सब कुछ तो गांधी का है”

मेरी रुचि ऐसे किसी नाम परिवर्तन में जरा सा नहीं है यदि एडविन लुटियंस मुख्य आर्किटेक्ट था तो”दिमाग जो राष्ट्रपति भवन के रूप में खड़ा है”कैसे बदल देंगे?

के एन साहनी | सच्ची रिपोर्ट, नई दिल्ली

नई दिल्ली। सत्ता के शिखर पर खड़ी भव्य इमारत एक बार फिर कटघरे में है। सवाल सीधा है, लेकिन चुभता हुआ—क्या केवल नाम और तस्वीर बदल देने से इतिहास का चरित्र बदल जाता है? “पूर्वांचल गांधी” कहे जाने वाले सामाजिक चिंतक ने राष्ट्रपति को लिखे पत्र में इसी मुद्दे पर वैचारिक बारूद फोड़ा है।
देश का सर्वोच्च संवैधानिक निवास राष्ट्रपति भवन क्या सच में लोकतंत्र का प्रतीक है, या फिर औपनिवेशिक वैभव की विरासत? पत्र में तर्क दिया गया है कि यदि भवन की आत्मा और उसकी सत्ता-मानसिकता जस की तस है, तो प्रतीकात्मक बदलाव केवल परदा है, परिवर्तन नहीं।
यह वही इमारत है जिसे ब्रिटिश वास्तुकार Edwin Lutyens ने डिजाइन किया था। तब इसका नाम वायसराय हाउस था—साम्राज्य का प्रतीक, जनसत्ता का नहीं। आलोचकों का सवाल है—जिस ढांचे की नींव औपनिवेशिक शासन ने रखी, क्या वह स्वतंत्र भारत की आत्मा का सच्चा प्रतिनिधि हो सकता है?
पत्र में ब्रिटिश वायसराय Lord Irwin का उल्लेख करते हुए याद दिलाया गया कि उनके कार्यकाल में Bhagat Singh, Sukhdev Thapar और Shivaram Rajguru को फांसी दी गई थी। सवाल उठता है—क्या इतिहास की इमारतें सिर्फ नाम बदलने से अपना अतीत छोड़ देती हैं?
पत्र यहीं नहीं रुकता। आज की प्रशासनिक संरचना पर भी प्रहार किया गया है। कहा गया है कि वर्तमान आईएएस-आईपीएस व्यवस्था दरअसल ब्रिटिशकालीन Indian Civil Service की विरासत है। हालांकि स्वतंत्र भारत में Sardar Vallabhbhai Patel ने इसे “स्टील फ्रेम” कहा और Jawaharlal Nehru ने इसे संवैधानिक जवाबदेही के ढांचे में ढालने की वकालत की, लेकिन आलोचक इसे “मानसिक औपनिवेशिकता” का स्थायी अवशेष मानते हैं। यहां तक कहा गया—“आईएएस-आईपीएस और वास्तविक लोकतंत्र साथ नहीं चल सकते।” यह कथन सत्ता और नौकरशाही के गलियारों में असहजता पैदा कर रहा है।
सबसे बड़ा प्रस्ताव भी उतना ही विस्फोटक है—राष्ट्रपति भवन को राष्ट्रपतियों का निवास न रखकर 1857 से 1947 तक के स्वतंत्रता संग्राम, किसान आंदोलनों, आदिवासी विद्रोहों और मजदूर संघर्षों का राष्ट्रीय संग्रहालय बनाया जाए। राष्ट्रपति के लिए निवास सादगीपूर्ण हो—वैसा ही प्रतीकात्मक जैसा Mahatma Gandhi की कुटिया।
यह बहस सिर्फ पत्थर और संगमरमर की नहीं है। यह उस मानसिकता की बहस है जो वैभव को शक्ति और सादगी को कमजोरी समझती है। आलोचकों का कहना है—अगर सच में औपनिवेशिकता से मुक्ति चाहिए, तो बदलाव शिक्षा में हो, विज्ञान में हो, प्रशासनिक आचरण में हो, संवैधानिक नैतिकता में हो। नाम बदलने से इतिहास नहीं बदलता, और न ही सत्ता की संस्कृति।
अब नजर इस पर है कि यह पत्र सत्ता के शीर्ष तक कितनी गूंज पैदा करता है। फिलहाल इतना स्पष्ट है—राष्ट्रपति भवन पर उठे ये सवाल सिर्फ दीवारों तक सीमित नहीं रहेंगे; ये लोकतंत्र की आत्मा को परखने वाली बहस का रूप ले चुके हैं।

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