सिधुआ बांगर : चुप्पी का खामियाजा भुगतता गांव

और आस्था कैसे बचेगी?
मां दुर्गा किसी एक की नहीं, पूरे गांव की मां हैं। मंदिर भी सबका है, फिर उसकी जिम्मेदारी कुछ लोगों तक सीमित क्यों?
गांव को शिव मंदिर का निर्माण याद रखना चाहिए। शिलान्यास फूलबदन निषाद ने किया और निर्माण कई लोगों के सहयोग से पूरा हुआ। आज हर वर्ग, हर जाति वहां शीश झुकाती है। यह मंदिर नहीं, गांव की एकता का प्रतीक है।
पुराने और जर्जर मां दुर्गा मंदिर के जीर्णोद्धार की दिशा में बाबू गुल्लू सिंह ने पहल करते हुए निर्माण सामग्री गिराई है। उनका स्पष्ट कहना है कि पहले रास्ता सुरक्षित और पक्का कराया जाए, ताकि हर मौसम में श्रद्धालु मंदिर तक पहुंच सकें।
यह पहल सराहनीय है, लेकिन अब असली परीक्षा गांव की है।
अब समय आ गया है कि

• सार्वजनिक भूमि को कब्जामुक्त कराया जाए

• और गांव की व्यवस्था को फिर से मजबूत बनाया जाए
अगर आज भी गांव नहीं जागा,
तो आने वाली पीढ़ियां न माफ करेंगी और न भूलेंगी।
यह खबर नहीं,
जनहित में चेतावनी है।
सिधुआ बांगर को अब तय करना है
चुप्पी या जागरूकता।

संपादकीय : के एन साहनी
ओम पत्रिका न्यूज

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