संपादकीय :शहीदों के नाम पर भाषण बहुत हो चुके,अब सरकारी नीतियों की सच्चाई सामने लाने का वक्त है
के. एन. साहनी
सच्ची रिपोर्ट, लखनऊ

भारत सशक्त राष्ट्र बनने का दावा करता है, लेकिन ज़मीन की सच्चाई यह है कि सरकारी नीतियाँ अक्सर शहीदों के बलिदान से मेल ही नहीं खातीं।
सरकारें बार-बार आज़ादी के नायकों का नाम लेकर तालियाँ तो बजा लेती हैं, पर नीतियाँ ऐसी बनाती हैं जो जमीनी हक़ीक़त और देशहित से अक्सर बिल्कुल उलट होती हैं।
खुदीराम बोस ने देश के लिए प्राण दे दिया,
आज का सिस्टम देश के युवाओं के सपनों को प्राणहीन कर रहा है।
शिक्षा नीति – किताबों में राष्ट्रभक्ति, जमीन पर बेरोजगारी
सरकारी नीतियों में राष्ट्रवाद की बातें खूब भरी गई हैं, लेकिन शिक्षा व्यवस्था युवाओं को आधी जानकारी और अधूरा इतिहास देकर छोड़ देती है।
नया सिलेबस इतिहास बदलने में लगा है, पर रोजगार सृजन, कौशल प्रशिक्षण, और सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता पर गंभीरता नहीं दिखती।
भर्तियाँ वर्षों लटकी रहती हैं, पेपर लीक होते हैं, और युवा हताश हो जाते हैं।
क्या यही स्वतंत्र भारत का सपना था?
किसान नीति – घोषणाएँ बड़ी, राहत छोटी
सरकार किसान को अन्नदाता कहती है,
लेकिन नीतियाँ ऐसे बनाई जाती हैं जैसे किसान अर्थव्यवस्था पर बोझ हों।
कभी एमएसपी पर वादा, कभी कृषि कानून, कभी समर्थन मूल्य पर भ्रम—
पूरी नीति एक एक्सपेरिमेंट बन गई है।
जो शहीद अपनी मिट्टी बचाने के लिए मरे,
आज उसी मिट्टी के मालिक किसान सड़कों पर बैठने को मजबूर हैं।
पुलिस-व्यवस्था – सुधार के नाम पर दिखावा
देश की पुलिस व्यवस्था अंग्रेजों के बनाए ढांचे पर ही चल रही है।
शहीदों ने आज़ादी दिलाई,
पर पुलिस आज भी “रूल बुक” नहीं, “दबाव और राजनीति” से चलती है।
संरक्षण देने वाली संस्था ही
जनता के दर्द और नेताओं के आदेश के बीच फँस जाती है।
नौजवानों के लिए नीति – घोषणाएँ ज्यादा, ज़मीन पर कार्रवाई कम
युवा देश की शक्ति हैं, पर नीति-निर्माण में युवा सबसे उपेक्षित वर्ग है।
- रोजगार योजनाएँ काग़ज़ पर
- स्टार्टअप योजना सिर्फ़ विज्ञापन में
- खेल नीति में सिर्फ़ तस्वीरें
- भर्ती प्रक्रियाएँ वर्षों अटकी हुई
सरकारें शहीदों का नाम तो लेती हैं, लेकिन खुदीराम जैसा साहस पैदा करने वाली व्यवस्था नहीं बनातीं।
विकास मॉडल – रिपोर्ट में चमक, गांवों में अंधेरा
फाइलों में इंडिया चमकता है,
ग्राउंड पर भारत अभी भी संघर्ष में है।
नीतियाँ अक्सर शहर-केंद्रित होती हैं।
गांव, किसान, मजदूर, छोटे दुकानदार, पेंशनर, गरीब—सब आंख बचाकर चलाए जा रहे हैं।
निचोड़ — देश शहीदों की आत्मा से बड़ा है, सरकारों के भाषणों से नहीं
एक सच्चाई साफ़ है—
शहीदों के नाम पर जो राजनीति चमकती है,
वह नीतियों में नहीं दिखती।
खुदीराम बोस ने अंग्रेजी शासन के अत्याचार के खिलाफ विद्रोह किया था।
आज जरूरत है कि
सिस्टम की विफल नीतियों के खिलाफ जनता आवाज़ उठाए।
सरकारें बदलती हैं,
चेहरे बदलते हैं,
लेकिन नीतियों में सुधार नहीं दिखता।
अगर भारत को अपनी वास्तविक पहचान चाहिए,
तो नीतियाँ जमीन, युवाओं और शहीदों की विरासत को ध्यान में रखकर बनानी होंगी।