जुतिया व्रत – महत्व, कथा और लोकगीत

14 सिपतंबर 2025 के एन साहनी
जुतिया व्रत (जिउतिया व्रत) अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को किया जाता है। यह खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और नेपाल के तराई क्षेत्रों में अत्यधिक श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
व्रत का महत्व

- संतान की रक्षा: माताएँ यह व्रत अपने पुत्र-पुत्रियों की रक्षा और दीर्घायु के लिए करती हैं।
- यमदूत से सुरक्षा: मान्यता है कि जुतिया व्रत से संतान पर आने वाले असमय मृत्यु के संकट टल जाते हैं।
- सामूहिक उत्सव: इस दिन गाँव की महिलाएँ एकत्र होकर कथा सुनती हैं, लोकगीत गाती हैं और पारंपरिक विधि से पूजा करती हैं।
🌼 व्रत विधि
- निर्जला उपवास: माताएँ सूर्य उदय से पहले स्नान कर व्रत का संकल्प लेती हैं और दिनभर जल तक नहीं पीतीं।
- पूजन सामग्री: दूब, हल्दी, कच्चा सूत, चावल, फूल, दीपक, फल, जल और मिट्टी की ज्येष्ठा माता की प्रतिमा।
- पूजा: पीपल या तुलसी के नीचे बैठकर ज्येष्ठा माता का पूजन किया जाता है।
- अर्घ्य: संतान का नाम लेकर अर्घ्य दिया जाता है और रात्रि में व्रत का समापन होता है।
📖 जुतिया व्रत की कथा
कथा के अनुसार –
प्राचीन काल में एक राजा की पत्नी और उसकी दासी ने यह व्रत किया। दासी ने व्रत पूरी निष्ठा से किया जबकि रानी व्रत में नियम तोड़ बैठी।
ज्येष्ठा माता रानी से अप्रसन्न हुईं और उसकी संतान अल्पायु हो गई।
दासी की संतान स्वस्थ और दीर्घायु हुई।
तब से यह मान्यता बन गई कि इस व्रत को सच्चे मन से करने पर संतान पर आने वाले सभी संकट दूर हो जाते हैं।
🎶 पारंपरिक लोकगीत (गीत)
जुतिया व्रत के अवसर पर महिलाएँ पारंपरिक गीत गाती हैं। कुछ प्रमुख गीत इस प्रकार हैं –
“जिउतिया मैया, राखिहु ललना,
चिरंजीवा करिहु हमार बेटवा।”
(हे जिउतिया माता, मेरे बच्चे की रक्षा करो और उसे दीर्घायु प्रदान करो।)
“सुतवा जिन मरऽs हे ज्येष्ठा मैया,
सुतवा के उमिरिया बढ़ा देहू।”
“जिउतिया के नेवता देहली,
मैया आ जइहैं, बचवा बाँचि जइहैं।”
इन गीतों में माताओं की प्रार्थना और संतान के प्रति उनका वात्सल्य भाव झलकता है।
🕉️ पारंपरिक मंत्र
पूजन के समय माताएँ यह मंत्र बोलती हैं –
“ॐ ज्येष्ठे देवि! संतान रक्षिणि!
मम पुत्रस्य दीर्घायुष्यम् कुरु।
अकालमृत्युं हर हर।”
(अर्थ – हे ज्येष्ठा माता! मेरी संतान की रक्षा करो, उसकी आयु बढ़ाओ और अकाल मृत्यु से दूर रखो।)
🌺 सांस्कृतिक महत्व
जुतिया व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह
- मातृत्व की शक्ति का प्रतीक है,
- समाज में एकजुटता और स्त्री-शक्ति का संदेश देता है,
- बच्चों के स्वास्थ्य और संस्कार को महत्व देता है।