न्याय का मंदिर और उसके प्रहरी: जज, अधिवक्ता और न्याय की उम्मीद”


“न्याय का मंदिर और उसके प्रहरी: जज, अधिवक्ता और न्याय की उम्मीद”

रिपोर्ट: के. एन. साहनी, कुशीनगर
स्थान: जिला एवं सत्र न्यायालय, कुशीनगर

न्यायपालिका भारत के लोकतंत्र का वह स्तंभ है, जिसकी बुनियाद “सत्य की जीत और अन्याय पर नियंत्रण” पर आधारित है। इसकी व्यवस्था में न्यायालयों की स्थापना और संचालन में पवित्रता और निष्पक्षता की मूल सोच निहित रही है।

जनपद कुशीनगर स्थित जिला एवं सत्र न्यायालय में प्रतिदिन हजारों की संख्या में वादकारियों की आवाजाही रहती है। न्याय की आशा लेकर आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की निगाहें अदालत के फैसलों पर टिकी रहती हैं — जहां दोषियों को सजा और निर्दोषों को बरी किए जाने की संवैधानिक व्यवस्था है।

श्री ओमप्रकाश जी, जो एक शांत स्वभाव के वरिष्ठ विशेष अधिवक्ता हैं, ने ‘न्यायपालिका के वर्तमान स्वरूप’ पर गहरी बात रखते हुए कहा,

“अधिवक्ता न्याय का पंडित होता है और जज देवता होता है। एक मुकदमा तभी अपने निष्कर्ष तक पहुंचता है जब उसमें बाबू, पेशकार, मुंशी और सहायकगण अपनी ईमानदारी और जिम्मेदारी से साथ निभाएं।”

श्री ओमप्रकाश जी का यह भी मानना है कि अदालत की कार्यवाही में अधिवक्ताओं की भूमिका केवल वकालत तक सीमित नहीं होती, बल्कि वे एक “सेतु” की तरह होते हैं, जो न्याय की राह पर जज और वादकारियों के बीच संवाद स्थापित करते हैं। वे न्यायाधीश के समक्ष तथ्यों को इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं कि सत्य उभरकर सामने आए।

गरीब और कमजोर के लिए न्याय – एक चुनौती

श्री ओमप्रकाश ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज भी समाज का गरीब तबका न्याय से वंचित महसूस करता है। कई बार आर्थिक असमर्थता के चलते कमजोर वर्ग के लोग मुकदमे के बीच में ही अदालत छोड़ देते हैं और चुपचाप अन्याय सहते रहते हैं।

“ऐसे में अधिवक्ताओं का धर्म बनता है कि वे समाज के वंचितों को न्याय दिलाने की पहल करें, क्योंकि यही न्याय की असली आत्मा है।”

न्यायपालिका की मर्यादा – सभी की जिम्मेदारी

यह आवश्यक है कि न्यायपालिका के हर घटक — चाहे वह जज हों, अधिवक्ता हों या न्यायालय स्टाफ — सभी अपने-अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा से करें। क्योंकि जिस दिन न्याय व्यवस्था की पवित्रता पर आमजन का विश्वास उठ जाएगा, लोकतंत्र की नींव डगमगाने लगेगी।



न्यायपालिका सिर्फ एक संस्था नहीं, बल्कि यह समाज में भरोसे का प्रतीक है। हर जज का धर्म है कि वह न्याय करे, हर अधिवक्ता का धर्म है कि वह सत्य को सामने लाए और हर नागरिक का हक है कि उसे न्याय मिले — चाहे वह गरीब हो या अमीर।


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