
रिपोर्ट: सच्ची रिपोर्ट, कुशीनगर
तथागत भगवान बुद्ध की नगरी कुशीनगर में एक सरकारी बस स्टेशन तो बना दिया गया, लेकिन सुविधाओं और व्यवस्था के नाम पर यहां कुछ भी व्यावहारिक नहीं दिखता। यह बस स्टेशन अब यात्रियों के लिए सुविधा केंद्र नहीं, बल्कि असमंजस और परेशानी का अड्डा बनता जा रहा है।

आज शाम लगभग 7 बजे बाबा धाम की यात्रा पर निकले कई महिला, वृद्ध और सामान्य यात्री बस स्टेशन पर समय बिताते मिले। कोई गोरखपुर तो कोई देवरिया जाने को आतुर था, लेकिन बसें कब आएंगी, किस प्लेटफॉर्म पर लगेंगी—इसकी कोई पक्की जानकारी नहीं थी।




एक यात्री ने कहा, “कोई कह रहा बस 7:20 पर आएगी, कोई कह रहा 8 बजे। आखिर हम किसकी बात मानें?” इस भ्रम की स्थिति से यात्रियों में नाराजगी साफ झलक रही थी।
प्रशासन नदारद, ताला जड़ा ऑफिस
यात्रियों ने जब स्टेशन के अनाउंसमेंट केंद्र और अफसर के ऑफिस पर जानकारी लेने की कोशिश की तो वहां ताला लटकता मिला। स्टेशन अधिकारी नदारद थे, कोई सूचना देने वाला भी नहीं। यह स्थिति तब है जब बस संचालन की सही जानकारी केवल अधिकृत स्टेशन कर्मचारी ही दे सकता है।
सुविधाएं दिखावटी, सिस्टम फेल
स्टेशन पर कुर्सियां, महिला एवं सीनियर सिटीजन वेटिंग रूम, और एसी सिस्टम जैसे संसाधन तो हैं, लेकिन बिना संचालन और जवाबदेही के ये सब ‘कागजी सुविधा’ बनकर रह गई हैं। एक यात्री ने कहा, “इधर-उधर भटक रहे हैं, कोई बताने वाला नहीं। यह सुविधा है या सजा?”
योगी सरकार से सवाल
प्रदेश की योगी सरकार ने परिवहन सुविधाओं के सुधार को प्राथमिकता दी थी, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे उलट दिख रही है। कुशीनगर बस स्टेशन की यह दुर्दशा सवाल खड़े करती है—क्या यात्रियों की समस्याएं सुनने वाला कोई है?
यदि जल्द ही स्टेशन प्रबंधन में सुधार नहीं हुआ, तो यह बस स्टेशन विकास का प्रतीक नहीं बल्कि एक “अंधेरी कालकोठरी” बन जाएगा।
अब सवाल यही है — बस स्टेशन के विकास और व्यवस्था की निगरानी आखिर कौन करेगा?