
कुशीनगर/गोरखपुर।
लेखक/एडिटर: के एन साहनी
सच्ची रिपोर्ट
कभी गरीब और मध्यम वर्ग की पहुंच में रहने वाली मूंगफली को आम बोलचाल में “गरीबों का बादाम” कहा जाता था। सर्दियों में मूंगफली स्वाद के साथ-साथ ऊर्जा और पोषण का सस्ता साधन मानी जाती रही है। लेकिन बदलते बाजार भाव ने अब इस सस्ते खाद्य पदार्थ की तस्वीर बदल दी है।
बादाम, काजू, पिस्ता और अखरोट जैसे महंगे ड्राई फ्रूट जहां अपेक्षाकृत संपन्न परिवारों के खानपान का हिस्सा माने जाते हैं, वहीं मूंगफली लंबे समय से आम परिवारों के लिए कम कीमत में मिलने वाला विकल्प रही है। इसी वजह से इसे “गरीबों का बादाम” कहा जाने लगा।
लेकिन अब स्थानीय बाजारों में भुनी हुई मूंगफली करीब 200 रुपये प्रति किलो तक बिकने की चर्चा है। कीमत बढ़ने से आम उपभोक्ताओं के सामने सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर मूंगफली जैसी सामान्य खाद्य वस्तु इतनी महंगी क्यों होती जा रही है।
मूंगफली की कीमत पर उत्पादन लागत, मौसम, मंडी भाव, परिवहन, मांग और खुदरा बाजार जैसे कई कारकों का असर पड़ सकता है। ऐसे में वास्तविक स्थिति जानने के लिए स्थानीय बाजार के भाव और व्यापारियों से मिलने वाली जानकारी महत्वपूर्ण होगी।
कभी गरीबों का बादाम कही जाने वाली मूंगफली अब 200 रुपये के पार पहुंच रही है। सवाल यह है कि बढ़ती कीमत का बोझ आखिर किसकी जेब पर पड़ रहा है?
आपके क्षेत्र में मूंगफली किस कीमत पर मिल रही है? कमेंट में अपने स्थानीय बाजार का भाव बताइए, ताकि अलग-अलग क्षेत्रों के वास्तविक आंकड़े सामने आ सकें।
