इंकलाब 14 अप्रैल 2026” : डॉ. संपूर्णानंद मल्ल का प्रधानमंत्री को तीखा पत्र, लोकतंत्र और विपक्ष की भूमिका पर बड़ा सवाल

इंकलाब 14 अप्रैल 2026” : डॉ. संपूर्णानंद मल्ल का प्रधानमंत्री को तीखा पत्र, लोकतंत्र और विपक्ष की भूमिका पर बड़ा सवाल

नई दिल्ली/कुशीनगर। पूर्वांचल के सामाजिक चिंतक डॉ. संपूर्णानंद मल्ल जिन्हें उनके समर्थक “पूर्वांचल गांधी” के नाम से संबोधित करते हैं ने नरेंद्र मोदी को संबोधित एक तीखा खुला पत्र जारी कर राष्ट्रीय राजनीति में बहस छेड़ दी है। पत्र में उन्होंने 14 अप्रैल 2026 को संसद के समक्ष “इंकलाब” का आह्वान करते हुए लोकतंत्र, विपक्ष और सत्ता की सीमाओं पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं।
पत्र का मूल स्वर: “कांग्रेस मुक्त” बनाम “लोकतांत्रिक भारत”
डॉ. मल्ल ने अपने पत्र में 2014 के उस राजनीतिक नारे का उल्लेख किया जिसमें “कांग्रेस मुक्त भारत” की बात कही गई थी। उनका तर्क है कि किसी भी दल का पूर्ण उन्मूलन लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप नहीं है, क्योंकि लोकतंत्र में विपक्ष का जीवित रहना आवश्यक शर्त है। उन्होंने लिखा कि सत्ता बदलती रहती है कभी भाजपा, कभी कांग्रेस, कभी कोई अन्य दल परंतु विपक्ष का अस्तित्व लोकतंत्र के “हृदय” की तरह अनिवार्य है।
ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला
पत्र में स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों महात्मा गांधी, वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, भीमराव अंबेडकर, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद समेत अनेक क्रांतिकारियों का उल्लेख करते हुए डॉ. मल्ल ने कहा कि आज की राजनीति को उनके आदर्शों की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, असहमति को स्थान देना ही स्वतंत्र भारत की आत्मा है।
“मोदी रहित राजनीति” की चेतावनी
डॉ. मल्ल ने अपने पत्र में प्रधानमंत्री से उत्तर की अपेक्षा जताई है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जवाब नहीं मिला तो वे “मोदी रहित भारतीय राजनीति” के लिए शांतिपूर्ण, सत्य-अहिंसक आंदोलन करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका विरोध किसी एक दल (जैसे भारतीय जनता पार्टी) के अस्तित्व से नहीं, बल्कि “नफरत और हिंसा की राजनीति” से है।
14 अप्रैल का प्रतीकवाद
14 अप्रैल जो भीमराव अंबेडकर की जयंती है को आंदोलन की तिथि घोषित करना भी प्रतीकात्मक माना जा रहा है। डॉ.मल्ल ने “एक विद्यालय, एक चिकित्सालय, एक रेल” जैसे नारे देते हुए समानता-आधारित कल्याणकारी व्यवस्था की मांग की है। उन्होंने बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक विषमता, शिक्षा-स्वास्थ्य की लागत और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन जैसे मुद्दों को आंदोलन का आधार बताया है।
संवैधानिक संस्थाओं को प्रतिलिपि
पत्र की प्रतिलिपि भारत का सर्वोच्च न्यायालय, राष्ट्रपति, गृह मंत्री, राज्यों के राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा जांच एजेंसियों को भेजे जाने का दावा किया गया है जिससे यह संकेत मिलता है कि वे इस मुद्दे को संवैधानिक विमर्श के दायरे में लाना चाहते हैं।
अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: लोकतंत्र की कसौटी पर भारत
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह पत्र ऐसे समय आया है जब विश्वभर में लोकतांत्रिक मूल्यों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विपक्ष की भूमिका पर बहस तेज है। भारत, जिसे विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, वहां सत्ता और प्रतिपक्ष के बीच संतुलन को लेकर उठते प्रश्न अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित करते हैं।
डॉ. मल्ल का यह पत्र न केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया है, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे के भविष्य पर वैचारिक चुनौती भी है। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय या केंद्र सरकार की ओर से इस पत्र पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया आती है या नहीं।

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