महंगाई, बेरोजगारी और बदहाल होती आम जनता: आखिर कब मिलेगी राहत?
संपादकीय: के०एन०साहनी

गोरखपुर यूपी।देश में बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और आम जनता की परेशानियों को लेकर लोगों के बीच लगातार चर्चा हो रही है। गांव से लेकर शहर तक हर वर्ग का व्यक्ति आज अपने दैनिक खर्चों, रोजगार और बच्चों की पढ़ाई को लेकर चिंतित दिखाई दे रहा है। लोग पुराने समय को याद करते हुए सवाल उठा रहे हैं कि आखिर वह दौर कौन सा था जब सुविधाएं आम आदमी तक आसानी से पहुंचती थीं।
एक समय ऐसा भी था जब गांवों और कस्बों में मच्छर जनित बीमारियों से बचाव के लिए हर घर के आसपास नियमित रूप से मच्छर रोधी दवाओं का छिड़काव कराया जाता था। स्वास्थ्य विभाग की टीमें गांव-गांव पहुंचती थीं और लोगों को बीमारी से बचाव के प्रति जागरूक करती थीं। आज स्थिति यह है कि डेंगू, मलेरिया और वायरल बुखार जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में नियमित छिड़काव बहुत कम देखने को मिलता है।
इसी तरह पहले राशन व्यवस्था के तहत कोटे की दुकानों पर गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को मिट्टी का तेल और चीनी उपलब्ध कराया जाता था। मिट्टी का तेल गरीब परिवारों के चूल्हे और लालटेन का सहारा होता था। समय के साथ यह व्यवस्था धीरे-धीरे सीमित होती चली गई, जिससे गरीब तबके पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ा।
लोग यह भी याद करते हैं कि एक समय रसोई गैस सिलेंडर लगभग 490 से 500 रुपये तक में उपलब्ध हो जाता था। तब घरेलू बजट कुछ हद तक संतुलित रहता था, लेकिन आज गैस, बिजली, खाद्य पदार्थ और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। महंगाई का असर सबसे अधिक मजदूर, किसान और निम्न मध्यम वर्ग पर दिखाई दे रहा है।
बेरोजगारी भी एक गंभीर समस्या बन चुकी है। पढ़े-लिखे युवा रोजगार की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं। निजी संस्थानों में सीमित अवसर हैं, जबकि सरकारी नौकरियों की संख्या कम होती जा रही है। गांवों में रोजगार के साधन कमजोर पड़ने से बड़ी संख्या में युवा शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
आम लोगों का यह भी आरोप है कि बैंकिंग व्यवस्था अब गरीबों के लिए पहले जैसी सहायक नहीं रह गई है। छोटे व्यापारियों, मजदूरों और कमजोर आर्थिक स्थिति वाले लोगों को आसानी से ऋण नहीं मिल पाता। बैंक गारंटी, दस्तावेज और आर्थिक स्थिति के आधार पर ऋण देने में कठोरता बरतते हैं, जिससे जरूरतमंद व्यक्ति आर्थिक रूप से और कमजोर हो जाता है। लोगों का कहना है कि यदि गरीब और छोटे व्यापारियों को सरलता से ऋण मिले तो वे आत्मनिर्भर बन सकते हैं।
शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी लोग पुराने दौर को याद कर रहे हैं। पहले कम संसाधनों में भी छात्र पढ़ाई करते थे। कई वर्षों तक एक ही पाठ्यक्रम और किताबों के माध्यम से शिक्षा चलती थी। आज शिक्षा का ढांचा आधुनिक जरूर हुआ है, लेकिन किताबों, कोचिंग और अन्य खर्चों ने गरीब परिवारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
इसके साथ ही जीएसटी और लगातार बढ़ती महंगाई को लेकर व्यापारियों और आम जनता में नाराजगी दिखाई दे रही है। छोटे दुकानदारों का कहना है कि टैक्स व्यवस्था और महंगे सामानों के कारण व्यापार प्रभावित हो रहा है। वहीं आम उपभोक्ता का कहना है कि हर वस्तु पर बढ़ती कीमतों ने घरेलू बजट बिगाड़ दिया है।
देश की जनता अब रोजगार, सस्ती शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और महंगाई से राहत की उम्मीद कर रही है। लोगों का कहना है कि सरकारों को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जिससे गरीब, किसान, मजदूर और मध्यम वर्ग को वास्तविक राहत मिल सके और देश में फिर से खुशहाली का माहौल बन सके।