कुड़वा स्टेट की कुलदेवी हैं माता कुलकुला देवी: कुंवर नरेंद्र कुमार सिंह
खुले आसमान के नीचे विराजमान मां की पिंडी, सदियों पुरानी आस्था का केंद्र; कभी लगता था विशाल पशु मेला, अब पर्यटन विकास की दरकार
कुशीनगर। जिले में स्थित माता कुलकुला देवी का धार्मिक स्थल आस्था, परंपरा और लोकविश्वास का ऐसा केंद्र है, जिससे कुड़वा स्टेट का इतिहास भी जुड़ा हुआ है। कुड़वा स्टेट के कुंवर नरेंद्र कुमार सिंह के अनुसार, माता कुलकुला देवी उनके राजपरिवार की कुलदेवी हैं और पीढ़ियों से परिवार एवं क्षेत्र के लोग श्रद्धा के साथ मां की पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं।
स्थानीय मान्यता है कि माता के दरबार में सच्चे मन से पहुंचकर मांगी गई मनोकामना पूरी होती है। यही वजह है कि यहां वर्षभर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। विशेष अवसरों, मांगलिक कार्यक्रमों और धार्मिक आयोजनों के दौरान मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की संख्या और बढ़ जाती है।
खुले आसमान के नीचे विराजमान हैं मां की पिंडी
कुलकुला देवी मंदिर की सबसे अलग और आकर्षक विशेषता मां की पिंडी का खुले आसमान के नीचे विराजमान होना है। मंदिर की संरचना में समय के साथ काफी बदलाव आया है और दीवारों को व्यवस्थित एवं सुसज्जित किया गया है, लेकिन मां की पिंडी के ऊपर आज भी छत नहीं है।
कुंवर नरेंद्र कुमार सिंह के अनुसार, परिवार में पीढ़ियों से चली आ रही मान्यता है कि करीब सौ वर्ष पहले मां की पिंडी के ऊपर छत बनाने का प्रयास किया गया था। निर्माण के बाद छत गिर गई। इसके बाद दोबारा पिंडी के ऊपर छत नहीं बनाई गई। तभी से यह मान्यता प्रचलित है कि माता को खुले आसमान के नीचे रहना ही प्रिय है।
यह परंपरा आज भी मंदिर की विशिष्ट पहचान बनी हुई है।
कभी चारों ओर जंगल और पशुओं का विशाल मेला
आज जिस स्थान तक श्रद्धालु आसानी से पहुंच सकते हैं, वह क्षेत्र कभी घने जंगल से घिरा हुआ बताया जाता है। उस समय मंदिर तक पहुंचने के लिए न तो बेहतर सड़कें थीं और न ही श्रद्धालुओं के ठहरने की कोई व्यवस्था।
स्थानीय लोगों के अनुसार, माता कुलकुला देवी के दरबार में कभी विशाल पशु मेला लगता था। आसपास के क्षेत्रों के अलावा दूर-दराज से भी लोग अपने पशुओं के साथ मेले में पहुंचते थे। मेले के कारण यह स्थान धार्मिक आस्था के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक मेल-जोल का भी महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करता था।
समय के साथ पशु मेले का स्वरूप बदल गया, जंगल कम हुए और आवागमन के साधन बढ़े, लेकिन माता के प्रति लोगों की आस्था कम नहीं हुई।
मन्नत पूरी होने पर आज भी होते हैं धार्मिक आयोजन
माता के दरबार में आज भी मन्नत मांगने और मनोकामना पूरी होने के बाद पूजा-अर्चना करने की परंपरा कायम है। कई परिवार यहां मांगलिक कार्यक्रम, धार्मिक अनुष्ठान और अन्य आस्था से जुड़े कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए यह केवल एक मंदिर नहीं बल्कि परिवार और क्षेत्र की धार्मिक परंपराओं से जुड़ा आस्था का केंद्र है।
श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए धर्मशाला की जरूरत
धार्मिक महत्व के बावजूद मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के ठहरने की पर्याप्त व्यवस्था का अभाव महसूस किया जाता है। विशेष आयोजनों के दौरान बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं एवं परिवारों को परेशानी होती है।
स्थानीय स्तर पर लंबे समय से मांग उठती रही है कि यहां—
- सार्वजनिक धर्मशाला का निर्माण कराया जाए।
- वर-वधू के लिए कम से कम दो बड़े कमरे बनाए जाएं।
- बरातियों और घरातियों के ठहरने की व्यवस्था हो।
- श्रद्धालुओं के लिए शौचालय और पेयजल की बेहतर व्यवस्था हो।
- मंदिर परिसर में प्रकाश व्यवस्था को मजबूत किया जाए।
- आने-जाने वाले रास्तों का समुचित विकास हो।
- पार्किंग और साफ-सफाई की व्यवस्था विकसित की जाए।
इन सुविधाओं के विकसित होने से धार्मिक आयोजनों के साथ स्थानीय लोगों को भी काफी सुविधा मिल सकती है।
पर्यटन स्थल के रूप में विकसित होने की अपार संभावना
कुलकुला देवी मंदिर केवल धार्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसके साथ जुड़ी पुरानी परंपराएं, लोककथाएं और कुड़वा स्टेट का इतिहास इसे पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाते हैं।
बताया जाता है कि विभिन्न समय में कई जिलों के आईएएस अधिकारियों ने इस स्थल को दर्शनीय एवं पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की पहल की थी। हालांकि इन प्रयासों को अपेक्षित गति नहीं मिल सकी।
यदि जिला प्रशासन, पर्यटन विभाग और स्थानीय जनप्रतिनिधि संयुक्त रूप से पहल करें तो इस धार्मिक स्थल को धार्मिक पर्यटन, सांस्कृतिक विरासत और ग्रामीण पर्यटन से जोड़ा जा सकता है।
इतिहास और आस्था को सुरक्षित रखने की जरूरत
कुंवर नरेंद्र कुमार सिंह का कहना है कि माता कुलकुला देवी का संबंध केवल एक परिवार की धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। यह स्थान क्षेत्र की पुरानी परंपराओं, लोकविश्वास और सामाजिक इतिहास से भी जुड़ा हुआ है।
ऐसे में मंदिर से जुड़ी पुरानी कथाओं, परंपराओं और ऐतिहासिक तथ्यों का दस्तावेजीकरण कराया जाना चाहिए। पुरानी पीढ़ी से मिली मौखिक परंपराओं को सुरक्षित रखने के लिए इतिहासकारों और शोधकर्ताओं को भी इस क्षेत्र का अध्ययन करना चाहिए।
प्रशासन और पर्यटन विभाग से उम्मीद
स्थानीय लोगों की मांग है कि माता कुलकुला देवी स्थल का सर्वे कराकर इसके विकास की कार्ययोजना तैयार की जाए। मंदिर परिसर के सौंदर्यीकरण के साथ श्रद्धालुओं की मूलभूत सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जाए।
यदि यहां धर्मशाला, विश्राम गृह, सड़क, पेयजल, प्रकाश, शौचालय, पार्किंग और सुरक्षा जैसी सुविधाएं विकसित होती हैं तो यह स्थल कुशीनगर जिले के प्रमुख धार्मिक स्थलों में अपनी अलग पहचान बना सकता है।
कुड़वा स्टेट के कुंवर नरेंद्र कुमार सिंह के अनुसार, माता कुलकुला देवी की आस्था पीढ़ियों से चली आ रही है। खुले आसमान के नीचे विराजमान मां की पिंडी आज भी उस पुरानी परंपरा की गवाही देती है, जिसे आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित करना जरूरी है।

