तारीख पर तारीख: अधिवक्ता का संघर्ष, पीड़ित की असली पीड़ा

तारीख पर तारीख: अधिवक्ता का संघर्ष, पीड़ित की असली पीड़ा

कुशीनगर/देवरिया।
देश की न्यायिक व्यवस्था पर आम जनता का विश्वास उसकी सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन जब यही व्यवस्था “तारीख पर तारीख” की संस्कृति में उलझ जाती है, तो सबसे गहरा आघात उस पीड़ित को होता है, जो न्याय की उम्मीद लेकर अदालत की चौखट पर पहुंचता है।
न्यायालयों में बढ़ते मुकदमों की संख्या और धीमी सुनवाई की प्रक्रिया ने एक गंभीर स्थिति पैदा कर दी है। अधिवक्ता, जो न्याय व्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, वे भी इस दबाव से अछूते नहीं हैं। लगातार बढ़ते वाद, सीमित समय, और जटिल प्रक्रियाओं के बीच उन्हें अपने दायित्वों का निर्वहन करना पड़ता है। उनका संघर्ष पेशे की मजबूरी है, लेकिन इसके बीच सबसे बड़ा दर्द उस व्यक्ति का है, जो किसी अन्याय का शिकार होकर न्याय की आस में वर्षों तक भटकता रहता है।
पीड़ित हर तारीख पर एक नई उम्मीद के साथ अदालत आता है। वह सोचता है कि आज शायद उसकी बात सुनी जाएगी, आज शायद उसे न्याय मिलेगा। लेकिन जब हर बार उसे केवल अगली तारीख ही मिलती है, तो उसका विश्वास धीरे-धीरे टूटने लगता है।
उसके सामने केवल एक मुकदमा नहीं होता, बल्कि उसका पूरा जीवन दांव पर लगा होता है—उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर होती जाती है, मानसिक तनाव बढ़ता है, और समाज का दबाव उसे अंदर ही अंदर तोड़ देता है।
कई बार परिस्थितियां इतनी विषम हो जाती हैं कि पीड़ित न्याय मिलने से पहले ही हार मानने को मजबूर हो जाता है। वह समझौता कर लेता है, भले ही उसके साथ अन्याय हुआ हो। यह केवल एक व्यक्ति की हार नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास की हार है।
एक समय था जब अदालतों को न्याय का मंदिर माना जाता था, जहां से सत्य की जीत सुनिश्चित होती थी। लेकिन आज “तारीख पर तारीख” की प्रवृत्ति ने इस विश्वास को कमजोर कर दिया है। यह स्थिति केवल एक प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि एक सामाजिक संकट का रूप लेती जा रही है।
अब समय आ गया है कि न्यायिक व्यवस्था में ठोस सुधार किए जाएं।
सुनवाई की प्रक्रिया को तेज, पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाए। लंबित मामलों के शीघ्र निस्तारण के लिए विशेष तंत्र विकसित किया जाए और तकनीकी संसाधनों का अधिकतम उपयोग किया जाए।
क्योंकि न्याय में देरी, कहीं न कहीं न्याय से वंचित करने के समान है।
अंततः सबसे बड़ा प्रश्न यही है—
क्या व्यवस्था ने कभी उस पीड़ित की पीड़ा को महसूस किया है, जो वर्षों तक केवल एक फैसले की प्रतीक्षा में अपनी जिंदगी गुजार देता है?
अगर इस प्रश्न का उत्तर “नहीं” है, तो सुधार की शुरुआत यहीं से होनी चाहिए।
क्योंकि न्याय केवल दिया ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि समय पर दिया जाना भी उतना ही आवश्यक है।

✍️ स्वतंत्र पत्रकार: के. एन. साहनी

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