जब गांव की ज़मीन पर उठी आवाज़, तो प्रशासन को सुननी पड़ी बात!”


✒️ विशेष रिपोर्ट

“जब गांव की ज़मीन पर उठी आवाज़, तो प्रशासन को सुननी पड़ी बात!”

डॉ. सम्पूर्णानंद मल्ल का सत्याग्रह टला, पर सवाल अब भी कायम हैं

📍 क्षेत्र: देवरिया, उत्तर प्रदेश
🗓️ दिन: बृहस्पतिवार, 3 जुलाई 2025
🖋️ रिपोर्ट: एन. साहनी

देवरिया जनपद के एक छोटे से गांव घुदीकुण्ड कला में ज़मीन को लेकर उठा विवाद अचानक जिले भर में चर्चा का विषय बन गया, जब सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षाविद् डॉ. सम्पूर्णानंद मल्ल ने चकबंदी में हो रही अनियमितताओं के खिलाफ सत्याग्रह की घोषणा कर दी।


⛰️ संघर्ष की जड़ में क्या है?

गांव की भूमि वर्षों से विवादों में घिरी रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि चकबंदी के नाम पर कुछ प्रभावशाली लोगों को लाभ पहुँचाया गया, जबकि असल ज़मीन के हकदारों की अनदेखी की गई। माप-जोख की प्रक्रिया में मनमानी के आरोप लगाए जा रहे हैं — खेतों की सीमाएं बदल दी गईं, और किसान भ्रम की स्थिति में फंसे हुए हैं।

इस पूरी प्रक्रिया ने तब और गंभीर मोड़ लिया, जब डॉ. मल्ल — जो खुद भी इसी गांव के रहने वाले हैं — ने अपनी आवाज़ बुलंद करते हुए चकबंदी कार्यालय में सत्याग्रह करने का निर्णय लिया।


🏛️ प्रशासनिक प्रतिक्रिया: समझौते की पहल

बृहस्पतिवार को डॉ. मल्ल चकबंदी कार्यालय, क्षेत्र देवरिया पहुँचे, जहाँ उन्होंने अपनी शिकायतों को दस्तावेज़ी रूप में सहायक चकबंदी अधिकारी जितेन्द्र प्रसाद को सौंपा। उन्होंने गांव के किसानों की व्यथा सामने रखते हुए निष्पक्ष पुनर्मापी की माँग की।

चकबंदी अधिकारी ने तत्परता दिखाते हुए अगले दिन विशेष टीम भेजकर पुनः मापी कराने का आश्वासन दिया। उनके इस आश्वासन के बाद डॉ. मल्ल ने तत्काल सत्याग्रह स्थगित करने की घोषणा की — लेकिन उन्होंने साफ़ कहा कि यदि कार्रवाई में ढिलाई हुई, तो वे फिर मैदान में उतरेंगे।


🌾 गांव की प्रतिक्रिया: “अब उम्मीद जगी है”

ग्रामवासियों के चेहरों पर आशा की झलक है। सत्याग्रह के पहले ही दिन प्रशासन के झुकने से एक संदेश गया है — कि यदि आवाज़ बुलंद हो, तो व्यवस्था को जवाब देना ही पड़ता है। बुजुर्ग किसान रामरतन यादव कहते हैं, “पहली बार किसी ने हमारे लिए आवाज़ उठाई है। अब उम्मीद है कि सही मापी होगी।”


❓ सवाल अब भी बाकी हैं…

  • क्या वास्तव में मापी निष्पक्ष होगी?
  • क्या प्रशासन वादे के अनुसार समय पर कार्रवाई करेगा?
  • क्या यह प्रयास अन्य गांवों के लिए एक उदाहरण बनेगा?

🔚 निष्कर्ष

डॉ. सम्पूर्णानंद मल्ल का यह कदम केवल एक गांव की लड़ाई नहीं, बल्कि उन हजारों किसानों की उम्मीद है जो वर्षों से चकबंदी की अनियमितताओं का शिकार हैं। यह मामला इस बात की मिसाल बन सकता है कि शांतिपूर्ण प्रतिरोध और तथ्यपरक संवाद से भी न्याय की राह खोली जा सकती है।


📌 रिपोर्ट: एन. साहनी, क्षेत्र देवरिया
📅 बृहस्पतिवार, 3 जुलाई 2025 | विशेष लेख – जनवाणी पत्रिका


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