बिना जाने बिना गुनाह किए लोग बदनाम क्यों करते है?

संपादकीय

जब विश्वास भी शर्मिंदा हो जाए

के.एन.साहनी,राइटर एवं एडिटर

किसी भी रिश्ते की बुनियाद विश्वास पर टिकी होती है। लेकिन जब कोई व्यक्ति बिना ठोस आधार के बार-बार किसी निर्दोष पर आरोप लगाने लगे, तब केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि विश्वास भी शर्मसार हो जाता है।

आज के समय में यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ती दिख रही है कि लोग पूरी बात जाने बिना ही किसी पर संदेह करने लगते हैं। आरोप लगाना आसान है, लेकिन उसका असर बेहद गहरा होता है। एक झूठा आरोप किसी की प्रतिष्ठा, मानसिक शांति और संबंधों को गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि कई लोग सच्चाई जाने बिना ही विवाद खड़ा कर देते हैं। न उन्हें सामने वाले की बात सुननी होती है और न ही तथ्य जानने की इच्छा होती है। ऐसे लोग हर छोटी बात को तूल देकर उसे झगड़े में बदल देते हैं।

दूसरी ओर, जो व्यक्ति निर्दोष होता है, वह बार-बार सफाई देते-देते थक जाता है। कई बार वह इसलिए चुप रह जाता है, क्योंकि उसे भरोसा होता है कि सच देर-सबेर सामने आ ही जाएगा।

यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि किसी पर आरोप लगाने से पहले उसकी सच्चाई जानना जरूरी है। केवल सुनी-सुनाई बातों या संदेह के आधार पर किसी के बारे में राय बना लेना न तो उचित है और न ही जिम्मेदारी का परिचायक।

समय बदल सकता है, परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, लेकिन सत्य नहीं बदलता। झूठ कुछ समय के लिए लोगों को भ्रमित कर सकता है, पर अंततः जीत सच की ही होती है।

इसलिए बोलने से पहले सोचें, आरोप लगाने से पहले जांच करें और किसी निर्दोष को बिना कारण दोषी न ठहराएँ। यही एक सभ्य और जिम्मेदार समाज की पहचान है।

के. एन. साहनी
राइटर एवं एडिटर

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