रामसर साइट की दिशा में बढ़ा कुशीनगर, 10 प्रमुख तालों के संरक्षण को बनेगा मास्टर प्लान
जिले की आर्द्रभूमियों को दिलाई जाएगी अंतरराष्ट्रीय पहचान, विशेषज्ञ समिति होगी गठित
कुशीनगर, 23 जून। जनपद की प्राकृतिक धरोहर एवं आर्द्रभूमियों (वेटलैंड्स) के संरक्षण तथा उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में जिला प्रशासन ने बड़ी पहल शुरू की है। उद्देश्य जिले की प्रमुख आर्द्रभूमियों को अंतरराष्ट्रीय महत्व की रामसर साइट में शामिल कराना है।
इस संबंध में जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर की अध्यक्षता में आयोजित विशेष वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग बैठक में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। बैठक में जिले के प्रमुख तालों की वैज्ञानिक मैपिंग, संरक्षण और विकास के लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने तथा उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति के गठन पर सहमति बनी।
समिति में Orchid University, दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, WWF-India, हिमालयी पर्यावरण संस्थान, Water Peace Institute, CWP तथा People Science Institute जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों को शामिल किया जाएगा।
बैठक में पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. उमर सैफ ने ‘प्लानिंग एवं स्टेकहोल्डर फ्रेमवर्क’ पर विस्तृत प्रस्तुति दी। जिलाधिकारी ने निर्देश दिया कि जिला, क्षेत्र पंचायत एवं ग्राम पंचायतों के टाइड फंड का उपयोग कर संबंधित क्षेत्रों को चरणबद्ध तरीके से जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) मॉडल के अनुरूप विकसित किया जाए, ताकि अशोधित अपशिष्ट जल आर्द्रभूमियों तक न पहुंच सके।
पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. कल्पना अरोड़ा को जेडएलडी योजना की रूपरेखा तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। साथ ही अन्य बड़े तालाबों को अधिसूचित कराने के लिए विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (डीपीआर) तैयार करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
जिला आर्द्रभूमि समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार जनपद की 10 प्रमुख आर्द्रभूमियों को क्षेत्रफल के आधार पर तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। वृहद श्रेणी में बांसगांव ताल (44.26 हेक्टेयर), मनखोटही ताल (41.81 हेक्टेयर) और तुर्कहा ताल (38.98 हेक्टेयर) शामिल हैं। मध्यम श्रेणी में खैरी तालाब (26.17 हेक्टेयर), राजमंदिर ताल (25.11 हेक्टेयर) तथा टिकर ताल (16.55 हेक्टेयर) को रखा गया है। जबकि सूक्ष्म श्रेणी में बड़हरा ताल, सूर्या ताल, कुन्दुर ताल और पिपरामाफी ताल शामिल हैं।
विशेषज्ञों ने बताया कि ये आर्द्रभूमियां जिले के प्राकृतिक आधारभूत ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये वर्षा जल का संचयन करती हैं, बाढ़ के प्रभाव को कम करती हैं, मृदा अपरदन रोकती हैं, प्राकृतिक रूप से जल का शोधन करती हैं तथा भूजल पुनर्भरण में अहम भूमिका निभाती हैं।
बैठक में यह भी बताया गया कि आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम 2017 के तहत इन तालों एवं इनके प्रभाव क्षेत्र में अतिक्रमण, भूमि उपयोग परिवर्तन, अशोधित सीवेज या औद्योगिक अपशिष्ट का निस्तारण, प्लास्टिक एवं ठोस कचरे की डंपिंग, नए प्रदूषणकारी उद्योगों की स्थापना तथा खतरनाक पदार्थों के भंडारण पर प्रतिबंध रहेगा।
जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर ने कहा कि कुशीनगर की आर्द्रभूमियों का संरक्षण केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जिले की पारिस्थितिक और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने का दायित्व भी है। उन्होंने विश्वास जताया कि रामसर साइट के रूप में मान्यता मिलने से इन आर्द्रभूमियों को वैश्विक पहचान प्राप्त होगी तथा संरक्षण एवं सतत विकास के नए अवसर खुलेंगे।
— रिपोर्ट : के. एन. साहनी, मुख्यालय, कुशीनगर
