न्याय की बलि चढ़ाता पुलिसिया ‘सिस्टम’, थाने से लेकर कप्तान की चौखट तक सिर्फ निराशा

न्याय की बलि चढ़ाता पुलिसिया ‘सिस्टम’, थाने से लेकर कप्तान की चौखट तक सिर्फ निराशा

कुशीनगर | ओम पत्रिका ब्यूरो जनपद कुशीनगर में कानून व्यवस्था और पुलिस की कार्यशैली पर एक गंभीर सवालिया निशान खड़ा हो गया है। हालिया घटनाओं और पीड़ितों के अनुभवों के आधार पर पुलिस पर ‘डबल गेम’ खेलने के संगीन आरोप लग रहे हैं। यहाँ पीड़ित को न्याय दिलाना तो दूर, पुलिस की कार्यप्रणाली मामले को सुलझाने के बजाय उसे और उलझाने और दोनों पक्षों के बीच ‘सौदेबाजी’ करने तक सीमित रह गई है।

जनसुनवाई और IGRS: महज एक कागजी दिखावा

मुख्यमंत्री की प्राथमिकताओं में शामिल IGRS (जनसुनवाई पोर्टल) को स्थानीय पुलिस ने मजाक बना दिया है। पीड़ितों का आरोप है कि:

  • बिना मिले निस्तारण: जाँच अधिकारी (IO) बिना वादी के पास जाए और बिना उनका पक्ष सुने, घर बैठे ही मनगढ़ंत रिपोर्ट तैयार कर देते हैं।
  • फर्जी रिपोर्ट का खेल: शिकायतों का निस्तारण केवल कागजों पर ‘OK’ दिखाने के लिए किया जा रहा है। पीड़ित को तब पता चलता है जब उसकी शिकायत बिना किसी कार्रवाई के बंद कर दी जाती है।

सहानुभूति की आड़ में ‘सौदेबाजी’

रिपोर्ट के मुताबिक, मारपीट की घटना के बाद पुलिस शुरुआत में पीड़ित के पास पहुँचकर सहानुभूति जताती है और मुकदमा भी दर्ज कर लेती है। लेकिन जैसे ही पीड़ित अपने इलाज और घर की परेशानियों में व्यस्त होता है, पुलिस का ‘असली खेल’ शुरू हो जाता है। आरोप है कि पुलिस दोषियों से संपर्क साधती है और मोटी रकम के बदले उन्हें न सिर्फ बचाने का आश्वासन देती है, बल्कि उन्हें बचाव का कानूनी रास्ता भी खुद सिखाती है।

क्रॉस एफआईआर: न्याय को ‘बराबरी’ पर खत्म करने की साजिश

पुलिस की सबसे घातक रणनीति ‘क्रॉस एफआईआर’ (दोनों पक्षों पर मुकदमा) दर्ज करना है। पीड़ित के मुकदमे के जवाब में दोषियों की तरफ से भी फर्जी काउंटर केस दर्ज कर दिया जाता है। मामला बराबरी पर आने के बाद पुलिस दोनों पक्षों पर समझौते का दबाव बनाती है, जिससे असली अपराधी बेखौफ हो जाते हैं और पीड़ित पूरी तरह टूट जाता है।

कप्तान की चौखट पर भी ‘सिस्टम’ का पहरा

थाने और IGRS से निराश होकर जब पीड़ित पुलिस अधीक्षक (SP) के पास न्याय की गुहार लगाने पहुँचता है, तो वहाँ भी उसे राहत नहीं मिलती। जनसुनवाई काउंटर पर तैनात कर्मचारी उसी थानेदार से रिपोर्ट मांगते हैं जिसके खिलाफ शिकायत होती है। थाने से मिली उसी ‘फर्जी आख्या’ को अंतिम सच मान लिया जाता है, जिससे कप्तान का कार्यालय भी पीड़ितों के लिए महज़ एक औपचारिक दरवाजा बनकर रह गया है।

अदालत और ‘तारीख पर तारीख’ का बोझ

व्यवस्था से हारकर पीड़ित अदालत का रुख करता है, जहाँ संघर्ष का एक और अंतहीन दौर शुरू होता है। वकीलों की भारी फीस और सालों तक चलने वाली “तारीख पर तारीख” पीड़ित को आर्थिक और मानसिक रूप से खोखला कर देती है। सच तो यह है कि जब तक न्याय की उम्मीद जागती है, तब तक पीड़ित अपना सब कुछ खो चुका होता है।

बड़ा सवाल: क्या जागेगी व्यवस्था?

“देर से मिला न्याय, अन्याय के बराबर होता है।” IGRS की फर्जी रिपोर्टिंग और पुलिस की यह ‘डबल गेम’ कार्यशैली उस भरोसे पर सीधी चोट है, जो आम जनता खाकी पर करती है। अब देखना यह है कि क्या शासन-प्रशासन इस गंभीर स्थिति पर कोई ठोस कार्रवाई करेगा?


संपादकीय विश्लेषण: के. एन. साहनी (संपादक: ओम पत्रिका)

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