पूर्वांचल गांधी को जेल भेजने का मामला: ACM-1 के ‘दबाव’ वाले बयान से गरमाया माहौल, कोर्ट के निर्देशों की धज्जियां उड़ाने का आरोप

पूर्वांचल गांधी को जेल भेजने का मामला: ACM-1 के ‘दबाव’ वाले बयान से गरमाया माहौल, कोर्ट के निर्देशों की धज्जियां उड़ाने का आरोप


विशेष रिपोर्ट: अंशुमान पाण्डेय


गोरखपुर।
उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। ‘पूर्वांचल गांधी’ के नाम से विख्यात डॉ. संपूर्णानंद मल्ल को जेल भेजे जाने के बाद गोरखपुर कलेक्ट्रेट से लेकर राजधानी तक का माहौल गरमा गया है। इस पूरे मामले में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब पत्रकारों की तीखी पूछताछ के बीच खुद सहायक सिटी मजिस्ट्रेट (ACM-1) प्रशांत वर्मा ने स्वीकार किया कि उन पर “ऊपर से दबाव” था।
प्रिवेंशन ऑफ पीस की कार्रवाई और ‘दबाव’ का रहस्य
डॉ. मल्ल की गिरफ्तारी के बाद जब पत्रकारों ने सिटी मजिस्ट्रेट और ACM-1 श्री प्रशांत वर्मा से न्यायालय परिसर में सीधी वार्ता की, तो प्रशासन की दलीलों में विरोधाभास साफ नजर आया।
ACM-1 प्रशांत वर्मा ने बताया कि यह पूरी कार्यवाही “प्रिवेंशन ऑफ पीस” (शांति भंग की आशंका) के तहत की गई है। प्रशासन का दावा है कि श्री गांधी ने कुछ महीनों पूर्व अपने एक पत्र में आत्महत्या या आत्मदाह करने की चेतावनी दी थी। मजिस्ट्रेट के अनुसार, “चूंकि श्री गांधी न्यायालय में अकेले आए थे और उनके पास जमानत के लिए मुचलका (बेल बॉन्ड) तुरंत उपलब्ध नहीं था, इसलिए उन्हें जिला जेल भेज दिया गया।”
लेकिन, कहानी यहीं खत्म नहीं होती। बातचीत के दौरान मजिस्ट्रेट के मुंह से यह भी निकल गया कि “ऊपर से दबाव भी था।” जब पत्रकारों ने तुरंत सवाल दागा कि “साहब, दबाव किसका था?” तो ACM-1 निरुत्तर हो गए और कुछ बोल न सके। हालांकि, उन्होंने माहौल को शांत करने के लिए अगले ही दिन बेल (जमानत) देने का आश्वासन जरूर दिया।
आत्मदाह के दावे पर प्रवक्ताओं का पलटवार: “गांधी स्व-हिंसा नहीं करते”
प्रशासन के इस ‘आत्मदाह’ वाले दावे को डॉ. मल्ल के लंबे समय से आधिकारिक मीडिया प्रवक्ता रहे अंशुमान पाण्डेय ‘बागी’ ने सिरे से खारिज कर दिया है।
“पूर्वांचल गांधी के जितने भी पत्र शासन-प्रशासन को जाते हैं, उन्हें भेजने की जिम्मेदारी मेरी रहती है। मेरे संज्ञान में ऐसा कोई पत्र नहीं है जिसमें श्री गांधी ने आत्मदाह या आत्महत्या जैसी कोई चेतावनी दी हो। पूर्वांचल गांधी एक महान क्रांतिकारी और विशुद्ध गांधीवादी विचारक हैं। वे पर-हिंसा (दूसरों के प्रति हिंसा) और स्व-हिंसा (खुद को चोट पहुंचाना), दोनों के घोर विरोधी हैं। उनके इसी उच्च चरित्र, अनुशासन और अहिंसक आंदोलन के कारण देश के करोड़ों लोग उन्हें ‘गांधी’ की उपाधि देते हैं। प्रशासन का यह आरोप बेबुनियाद और मनगढ़ंत है।”


अंशुमान पाण्डेय ‘बागी’, मीडिया प्रवक्ता
कलेक्ट्रेट में दिनभर ड्रामा, बेल बॉन्ड के बाद भी शाम तक नहीं बैठे मजिस्ट्रेट
आश्वासन के मुताबिक, अगले दिन सुबह ही डॉ. संपूर्णानंद मल्ल के समर्थक और अधिवक्ता जमानत कराने भारी संख्या में कलेक्ट्रेट पहुंचे। न्यायालय के समक्ष बेल बॉन्ड (जमानत पत्र) भी प्रस्तुत कर दिया गया। लेकिन, इसके बाद शुरू हुआ टालमटोल का खेल।
समर्थकों को पहले शाम 04 बजे तक इंतजार करने को कहा गया। हद तो तब हो गई जब शाम ढलने तक भी ACM-1 अपनी कुर्सी (न्यायालय) पर नहीं बैठे। इसी बीच नाम न छापने की शर्त पर न्यायालय के ही एक कर्मचारी ने अंदरूनी सच्चाई बयां करते हुए कहा, “साहब पर बहुत बड़ा दबाव है, अब सोमवार से पहले बेल संभव नहीं दिखती।”
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के आदेशों की सरेआम अवहेलना
प्रशासन का यह रवैया देश की सर्वोच्च कानूनी व्यवस्था को चुनौती देता नजर आ रहा है।
उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) और इलाहाबाद उच्च न्यायालय (High Court) के सख्त निर्देश हैं कि शांति भंग (धारा 151/107/116) जैसे मामलों का निपटारा ‘सेम डे’ (उसी दिन) किया जाना चाहिए, ताकि किसी भी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन न हो।
अभी हाल ही में एक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि “उत्तर प्रदेश में पुलिस जनता के प्रति नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक आकाओं के प्रति जिम्मेदार हो चुकी है।”
गोरखपुर का यह घटनाक्रम हाई कोर्ट की उस तल्ख टिप्पणी की जीती-जागती मिसाल बनता दिख रहा है।
सुलगते सवाल: जांच के दायरे में कलेक्ट्रेट?
इस पूरे घटनाक्रम के बाद जनता और मीडिया के गलियारों में कुछ सवाल बेहद लाजिमी हो गए हैं:
सहायक सिटी मजिस्ट्रेट (ACM-1) प्रशांत वर्मा पर आखिर “ऊपर से” किसका दबाव था?
एक अहिंसक और बुजुर्ग विचारक को अपराधी की तरह जिला जेल में रखने के पीछे किस राजनीतिक या प्रशासनिक आका का प्रभाव काम कर रहा है?
क्या गोरखपुर प्रशासन उच्च न्यायालय के ‘सेम डे डिस्पोजल’ के आदेशों से भी ऊपर हो चुका है?

पूर्वांचल गांधी को इस तरह सलाखों के पीछे रखना और जमानत याचिका पर जानबूझकर देरी करना, लोकतांत्रिक मूल्यों और न्यायपालिका की साख पर एक बड़ा आघात है। यह पूरा मामला एक उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच का विषय वस्तु है, ताकि जनता के सामने सच आ सके कि आखिर इस ‘दबाव’ की बिसात के पीछे असली मोहरे कौन हैं।

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