माननीय जी! वोट की तरह हाथ जोड़ो, अतिक्रमण मुक्ति पर अपना प्रभाव छोड़ो…”

माननीय जी! वोट की तरह हाथ जोड़ो, अतिक्रमण मुक्ति पर अपना प्रभाव छोड़ो…”


✍️ गौरी शंकर इंसान
आई कैन न्यूज / पडरौना, कुशीनगर


कभी शहरों में फुटपाथ हुआ करते थे। पैदल चलने वाले लोग भी सम्मान के साथ अपने गंतव्य तक पहुंच जाते थे। बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं — सबके लिए रास्ता सुरक्षित था। मगर अब फुटपाथ पर इंसान नहीं, सामान चलता है। दुकानों की सजावट सड़क तक और सड़क का अधिकार अतिक्रमण तक पहुंच चुका है।
जनप्रतिनिधि चुनाव के समय folded hands लेकर जनता के बीच आते हैं, मगर चुनाव खत्म होते ही वही हाथ अतिक्रमण पर मौन आशीर्वाद देने लगते हैं। प्रशासन कार्रवाई की बात करता है, व्यापारी “रोजगार” का तर्क देते हैं और आम आदमी जाम में फंसकर अपनी किस्मत को कोसता रहता है।
आज शहर में टू-लेन सड़क को फोर-लेन बनाने की तैयारी हो रही है। करोड़ों खर्च होंगे, मशीनें चलेंगी, नक्शे बनेंगे, भाषण होंगे — लेकिन सवाल वही रहेगा…
अगर फुटपाथ ही कब्जे में रहेगा तो फोर-लेन भी आखिर कब तक राहत देगा?
कुछ दुकानदारों का सिद्धांत बड़ा साफ है — “जो दिखता है वही बिकता है।”
इस सोच में दुकान अंदर कम और सड़क पर ज्यादा सजती है। जिनके पास पर्याप्त निजी जगह है, वे भी फुटपाथ पर कब्जा जमाए बैठे हैं। पैदल चलने वाला सड़क पर उतरता है, फिर दुर्घटना होती है और जिम्मेदारी “व्यवस्था” पर डाल दी जाती है।
अब सवाल जनता पूछ रही है —
क्या ऐसे अतिक्रमणकारियों पर भारी जुर्माना लगे?
क्या कानूनी कार्रवाई हो?
या फिर हर बार की तरह केवल चेतावनी देकर मामला ठंडा कर दिया जाए?
सबसे ज्यादा परेशानी उस आम आदमी को है जो पैदल चलता है, साइकिल से निकलता है, या समय पर अस्पताल पहुंचना चाहता है। जाम में फंसी एम्बुलेंस, रास्ता तलाशती फायर ब्रिगेड और घंटों रेंगती यातायात व्यवस्था — ये किसी शहर की तरक्की नहीं, अव्यवस्था की तस्वीर है।
सड़क चौड़ी होनी चाहिए, विकास भी होना चाहिए, लेकिन विकास का पहला नियम यह होना चाहिए कि सड़क सड़क रहे, बाजार न बन जाए।
जनता चाहती है कि प्रशासन निष्पक्ष होकर कार्रवाई करे और जनप्रतिनिधि राजनीति से ऊपर उठकर शहर के भविष्य के बारे में सोचें। क्योंकि आखिर सवाल सिर्फ सड़क का नहीं, शहर की पहचान और नागरिकों के अधिकार का है।
अपना शहर, अपनी सड़क — व्यवस्थित हो, सुरक्षित हो, सबके लिए हो…

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