पारंपरिक होली की गरिमा बचाने के लिए सख्त कानून और सामाजिक जागरूकता की जरूरत,

कपड़ा फाड़ होली ने छीना त्योहार का सम्मान🌻जहाँ कभी अबीर-गुलाल की खुशबू थी, आज वहाँ डर और अराजकता का साया 30 प्रतिशत हुड़दंगियों के कारण महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग घरों में कैद होने को मजबूर।🌻 पारंपरिक होली की गरिमा बचाने के लिए सख्त कानून और सामाजिक जागरूकता की जरूरत,कुशीनगर/उत्तर प्रदेश।

होली,जो कभी प्रेम, भाईचारे और संस्कृति का प्रतीक थी, आज अपने मूल स्वरूप से भटकती नजर आ रही है। गुजिया-पकवान की मिठास, फाग गीतों की मधुरता और गले मिलकर मनाए जाने वाला यह पर्व अब एक वर्ग विशेष की अराजकता का शिकार बनता जा रहा है।
समाज का एक छोटा किन्तु आक्रामक हिस्सा, लगभग 30 प्रतिशत हुड़दंगी मानसिकता वाले लोग, पूरे त्योहार की गरिमा पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। शराब के नशे में समूह बनाकर निकलना, राह चलते लोगों के साथ जबरदस्ती करना, कपड़े फाड़ देना, विरोध करने पर मारपीट करना—यह परंपरा नहीं, अपराध है।
स्थिति यह है कि पढ़ा-लिखा और सभ्य समाज होली के दिन घर से बाहर निकलने से कतराने लगा है। महिलाएँ और बुजुर्ग स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं। कई परिवार दरवाजे बंद कर लेते हैं, मानो उत्सव नहीं बल्कि भय का माहौल हो।
होली हमारी सांस्कृतिक पहचान है। इसमें हास्य-परिहास था, परंतु अपमान नहीं; रंग था, परंतु जबरदस्ती नहीं; उत्साह था, परंतु अश्लीलता नहीं। “कपड़ा फाड़ होली” जैसी प्रवृत्तियाँ न केवल व्यक्ति का, बल्कि पूरे समाज का अपमान करती हैं।
ऐसे में प्रशासन और सरकार की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि संवेदनशील क्षेत्रों में कड़ी निगरानी रखी जाए, अवैध शराब पर रोक लगे और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। साथ ही समाज को भी आगे बढ़कर सांस्कृतिक कार्यक्रमों, फाग गायन और सामूहिक मिलन समारोहों के माध्यम से पारंपरिक होली को पुनर्जीवित करना होगा।
यदि 30 प्रतिशत लोग माहौल बिगाड़ सकते हैं, तो 70 प्रतिशत सजग नागरिक मिलकर उसे सुधार भी सकते हैं। आवश्यकता केवल संकल्प और साहस की है।
होली प्रेम का पर्व है, भय का नहीं।
अब समय आ गया है कि समाज एक स्वर में कहे त्योहार बचाओ, हुड़दंग मिटाओ।के. एन. साहनी
संपादक, ओम पत्रिका, उत्तर प्रदेश

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