पुरैनी कुटी का अस्तित्व खतरे में!
पुजारी दूधनाथ के कार्यकाल से साधु-संतों में आक्रोश
सैकड़ों साल पुराने मंदिर की व्यवस्था पर उठे सवाल, आय-व्यय और साधु-संतों के सम्मान को लेकर गंभीर आरोप
कुशीनगर। जनपद के पुरैनी कुटी मंदिर का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना बताया जाता है। धार्मिक आस्था और साधु-संतों की परंपरा से जुड़े इस प्राचीन मंदिर की वर्तमान व्यवस्था को लेकर साधु-संतों में असंतोष सामने आया है। पुजारी दूधनाथ के कार्यकाल को लेकर संतों ने मंदिर की व्यवस्था, धार्मिक परंपराओं और आय-व्यय पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
रघुबीर दास ने किया था 200 साल पहले मंदिर का शिलान्यास
साधु-संतों के अनुसार पुरैनी कुटी मंदिर का शिलान्यास रघुबीर दास ने किया था। यह स्थान लंबे समय से साधु-संतों और श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है। संतों का कहना है कि मंदिर की सेवा और धार्मिक परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।
गुरु के बाद तीन पीढ़ियों से सेवादारों ने संभाली सेवा
गगनदीप दास के अनुसार, उनके गुरु के बाद पुरैनी कुटी की सेवा-व्यवस्था तीन पीढ़ियों से सेवादारों द्वारा संभाली जाती रही है। उनके मुताबिक इन पीढ़ियों में मंदिर की धार्मिक परंपराओं, पूजा-पाठ और साधु-संतों की सेवा को महत्व दिया जाता रहा।
गगन दास का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था को लेकर संत समाज में कई सवाल खड़े हुए हैं। उनका आरोप है कि मंदिर की परंपरा और व्यवस्था जिस भावना के साथ आगे बढ़ाई गई थी, उसमें बदलाव महसूस किया जा रहा है।
मंदिर की आय और खेती-बारी के धन पर सवाल
साधु-संतों का आरोप है कि मंदिर की खेती-बारी से होने वाली आमदनी तथा अन्य संसाधनों के उपयोग में पारदर्शिता नहीं है। आरोप लगाया गया है कि खेती-बारी से प्राप्त धन का निजी इस्तेमाल किया जाता है।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। मंदिर की आय-व्यय, कृषि भूमि और उससे होने वाली आमदनी से संबंधित अभिलेखों की जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
“साधु का स्वभाव ही नहीं लगता”:परिखन दास
साधु-संतों में शामिल परिखन दास ने पुजारी दूधनाथ की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनके व्यवहार में साधु का स्वभाव नजर नहीं आता। संतों ने आरोप लगाया कि मंदिर में आने वाले साधु-संतों का उचित सम्मान नहीं किया जाता, जिससे संत समाज में नाराजगी बढ़ रही है।
अस्तित्व और परंपरा बचाने की मांग जारी
संतों का कहना है कि पुरैनी कुटी केवल एक मंदिर नहीं बल्कि सैकड़ों वर्षों की धार्मिक परंपरा और साधु-संतों की तपस्या से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। इसलिए मंदिर की संपत्ति, खेती-बारी की आय और खर्च का पारदर्शी हिसाब होना चाहिए।

साधु-संतों ने संबंधित अधिकारियों से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने तथा मंदिर की प्राचीन परंपरा, संपत्ति और धार्मिक गरिमा को सुरक्षित रखने की मांग की है।
रिपोर्ट: के एन साहनी
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